चीनी उत्पादन में फिर कैसे बिहार बने सिरमौर

कभी उद्योग के क्षेत्र में खुद में अग्रणी कहलाने वाला बिहार, अब सिर्फ इतिहास के पन्नों पर सिमट कर रह गया है. सरकार की लगातार बेरुखी के कारण बिहार ने उद्योग के क्षेत्र में केवल पहचान ही नहीं गंवाई बल्कि अपने अस्तित्व को भी खो दिया है. चीनी उत्पादन से विश्व भर में अपनी धाक जमाने वाला बिहार, अब दूसरे राज्यों के मुकाबले भी उत्पादन नहीं कर पा रहा है. देश को कभी कुल उत्पादन का 40 फीसद चीनी देने वाला बिहार, मुश्किल से अब 4 फीसद ही उत्पादन कर पा रहा है. आजादी से पहले की बात करें तो बिहार में कुल मिलाकर 33 चीनी मिलें थीं, जिसकी संख्या अब घटकर 28 पर सिमट गई है, तो वहीं इसमें से 10 चीनी मिलों को सरकार द्वारा निजी प्रबंधन के हाथों दे दिया गया है. राज्य के बगहा और मोतिहारी जिले की चीनी मिलों की स्थिति जर्जर है, तो मधुबनी जिले के सकरी का अस्तित्व भी मिट चुका है. इसी के साथ दरभंगा जिले के रैयाम चीनी मिल तो अपनी दुर्दशा पर आंसू बहा रहे हैं और लोहट चीनी मिल पुन: खुलने की आस में इंतजार कर रहा है.
बिहार में चीनी मिलों का आवागमन
एक चीनी एनस्कालोपिडिया के रिकॉर्ड के मुताबिक सम्राट ताई सुंग (627 से 650 ईस्वी) के शासनकाल में चीनी सरकार ने चीनी छात्रों के एक बैच को बिहार भेजा था ताकि वो गन्ना और चीनी के विनिर्माण की खेती की विधि का अध्यन कर सकें. उस वक्त भारत का पूर्वी हिस्सा चीनी उत्पादन में माहारत हासिल कर चुका था और विदेशों में निर्यात करने लगा था. लेकिन सन् 1453 ईस्वी में इंडोनेशिया पर जब तुर्की ने शासन किया तो चीनी की निर्यात पर अतिरिक्त कर लगा दिया, जिससे चीनी का व्यापार बाधित होता चला गया, और धीरे-धीरे यह व्यापार दम तोड़ता गया जिसके कारण विदेशों में चीनी की मांग बढती गई. सन् 1792 ईस्वी में ईस्ट इंडिया कंपनी ने विदेशों में बढ़ रही चीनी की मांग को देखते हुए अपना एक प्रतिनिधिमंडल भारत भेजा. चीनी उत्पादन की संभावनाओं का पता लगाने के लिए लुटियन जे पीटरसन के नेतृत्व में भारत आए प्रतिनिधिमंडल ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि बंगाल प्रेसिडेंसी के तिरहुत इलाके में न केवल जमीन उपयुक्त है, बल्कि यहां सस्ते मजदूर और परिवहन की सुविधा भी मौजूद है. उस वक्त यह इलाका नील की खेती के लिए जाना जाता था. इस रिपोर्ट के आने के बाद नील की खेती में मुनाफा कम देख इलाके के किसान भी ईंख की खेती को अपनाने लगे. इधर, ईंख पैदावार के साथ ही सन् 1820 में चंपारण क्षेत्र के बराह स्टेट में चीनी की पहली शोधक मिल स्थापित की गई. मिस्टर स्टीवर्ट की अगुवाई में 300 टन वाले इस कारखाने में ईंख रस से आठ फीसद तक चीनी का उत्पादन होता था. यहां उत्पादित चीनी तिरहुत इलाके के लोगों को देखने के लिए भी नहीं मिलता था और सारा माल पंजाब समेत पश्चिमी भारत में भेज दिया जाता था. सन् 1877 आते-आते पश्चिमी तिरहुत के पांच हजार हैक्टेयर वाली नील की खेती सिमट कर 1500 हैक्टेयर में रह गई और दो हजार हैक्टेयर में ईंख की खेती शुरू हो गई. सन् 1903 आते-आते ईंख ने तिरहुत से नील को हमेशा के लिए विदा कर दिया. तिरहुत का इलाका परिष्कृत चीनी का स्वाद 19वीं शताब्दी में चख पाया, जब यहां चीनी उद्योग का विकास प्रारंभ हुआ. 1903 से तिरहुत में आधुनिक चीनी मिलों का आगमन शुरू हुआ. 1914 तक चंपारण के लौरिया समेत दरभंगा जिले के लोहट और रैयाम चीनी मिलों से उत्पादन शुरू हो गया. 1918 में न्यू सीवान और 1920 में समस्तीपुर चीनी मिलों में काम शुरू हो गया. इस प्रकार क्षेत्र में चीनी उत्पादन की बड़ी इकाई स्थापित हो गई.
क्यों घटी राज्य में चीनी मिलों की संख्या –
सन् 1966-67 ईस्वी तक बिहार के निजी मिल मालिकों ने चीनी कंपनियों पर पूरी तरह अपना कब्जा जमा लिया और ऐसी नीति अपनाने लगे ताकि चीनी पर से सरकार का नियंत्रण पूर्ण रूप से खत्म हो जाए. इस कारण चीनी मिलों पर मालिकों और सरकार के बीच टकराव बढने लगा. सन् 1972 में केंद्र सरकार द्वारा चीनी उद्योग जांच समिति की स्थापना की गई. चीनी उद्योग की स्थिति और समस्या की जांच कर रही समिति ने सन् 1972 के आखिरी सप्ताह में सरकार को अपनी रिपोर्ट सौंपी. समिति ने सरकार को चीनी कारखानों का अधिग्रहण करने का सुझाव दिया. फलस्वरूप बिहार सरकार ने सन् 1977 से 85 के बीच 15 से ज्यादा चीनी मिलों का अधिग्रहण कर लिया. इसमें समस्तीपुर (समस्तीपुर शुगर सेन्ट्रल शुगर लिमिटेड), रैयाम (तिरहुत कॉपरेटिव शुगर कंपनी लिमिटेड), गोरौल (शीतल शुगर वर्क्स लिमिटेड), सिवान (एस.के.जी. शुगर लिमिटेड), गुरारू (गुरारू चीनी मिल), न्यू सिवान (न्यू सिवान शुगर एंड गुड़ रिफ़ाइनिग कंपनी), लोहट (दरभंगा शुगर कंपनी लिमिटेड), बिहटा (साउथ बिहार शुगर मिल लिमिटेड), सुगौली (सुगौली शुगर वर्क्स लिमिटेड), हथुआ (एस.के.जी. शुगर लिमिटेड), लौरिया (एस.के.जी. शुगर लिमिटेड), मोतीपुर (मोतीपुर शुगर फैक्ट्री), सकरी (दरभंगा शुगर कंपनी लिमिटेड), बनमनखी (पूर्णिया कॉपरेटिव शुगर फैक्ट्री लिमिटेड), वारिस अली गंज (वारिस अली गंज कॉपरेटिव शुगर मिल लिमिटेड), का अधिग्रहण किया गया. इन मिलों को चलाने के लिए बिहार स्टेट शुगर कॉर्पोरेशन लिमिटेड (बीएसएसएल) की स्थापना सन् 1974 ई० में हुई थी, जो चीनी मिलों के घाटे को नियंत्रित कर इसका सुचारू रूप से प्रबंधन करने का काम करता था, लेकिन इनमें से ज्यादातर इकाईयों कि कीमतों में गिरावट और इनपुट में लागतार वृद्धि के दबाव को (बीएसएसएल) नहीं झेल सकी. फलस्वरूप एक के बाद एक यूनिट बंद होती चली गई. सन् 1996 से सन् 1997 ईस्वी के पेराई सीज़न के बाद इसको पुनर्जीवित करना बंद हो गया और सारी इकाइयां बंद पड़ गईं. घाटे का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि इन इकाइयों पर किसानो का 8.84 करोड़ रुपया और कर्मचारियों का 300 करोड़ रुपया बकाया था. सन् 1990 आते-आते तिरहुत में ईंख की खेती कुछ जिलों तक सिमट कर रह गई और हजारों हैक्टेयर में गेहूं की खेती शुरू हो गई. सन् 1997 आते-आते गेहूं ने तिरहुत से ईंख को नकदी फसल के रूप में विदा कर दिया.
चीनी मिलों के पुनर्जीवन की कोशिश
फरवरी सन् 2006 में बिहार सरकार ने आखिरकार चीनी मिल पर चुप्पी तोड़ते हुए यह स्वीकार कर लिया था कि वो बंद मिलों को चलाने में असमर्थ है. सन् 1977 में चीनी मिलों के घाटे को नियंत्रित कर इसका सुचारू रूप से प्रबंधन करने का दावा झूठा साबित हुआ. मिलों को फिर से चालू करने के लिए सरकार ने गन्ना विकास आयुक्त की अध्यक्षता में एक उच्च स्तरीय बैठक बुलायी थी. इसमें समिति ने राय दी कि बिहार स्टेट शुगर कॉर्पोरेशन लिमिटेड की बंद पड़ी चीनी मीलों को पुनर्जीवित करने के लिए एक वित्तीय सलाहकार को नियुक्त किया जाए, जो इन बंद पड़े चीनी मिलो के पुनरुद्धार के लिए कोई सटीक योजना बना सके. इसके तहत एसबीआई कैपिटल को यह काम सौंपा गया. समिति ने अंततः इन इकाइयों के लिए निविदा आमंत्रित करने का फैसला किया और निजी निवेशकों को आमंत्रित किया कि वो इन बंद पड़ी चीनी मिलों का पुनरुद्धार / पुनर्गठन / कर लीज़ पर लें. शुरुआत से ही निवेशकों की दिलचस्पी ना के बराबर रही. सन् 2012 के दिसंबर में टेंडर भरने के आखिरी दिन तक तीन चीनी मिलों के लिए सिर्फ छह आवेदन ही मिल पाए.
नाकाम रही सरकार
एसबीआई कैपिटल ने परिसंपत्तियों के मूल्यनिर्धारण, परिचालन और वित्तीय मापदंडों के आधार पर बिहार सरकार को एक संक्षिप्त रिपोर्ट दिया. इसमें बंद पड़ी 15 मिलों में से 14 मिलों को ही फिर से चलाने का सुझाव दिया जबकि सकरी मिल को विलोप करने की बात कही गई. समिति के अनुसार लोहट और रैयाम के बीच स्थित होने के कारण इस मिल के लिए गन्ना अधिकार क्षेत्र उपलब्ध नहीं सकता है. अतः इसकी 115 एकड़ जमीन को किसी अन्य कार्य के लिए आवंटित किया जाना चाहिए. लोहट के मुनाफे से सन् 1933 में स्थापित 782 टीएमटी क्षमता वाली इस मिल के वजूद को खत्म कर दिया गया. इस प्रकार बिहार की चीनी मिलों के इतिहास में सकरी पहली इकाई रही जो केवल बंद ही नहीं हुई बल्कि उसे हमेशा के लिए खत्म कर दिया गया. सरकार की इस पहल से ऐसा भी नहीं हुआ कि अन्य मिलें पुनर्जीवित हो गईं. सकरी और रैयाम को महज़ 27.36 करोड़ रुपये की बोली लगाकर लीज़ पर लेने वाली कंपनी तिरहुत इंडस्ट्री ने नई मशीन लगाने के नाम पर रैयाम चीनी मिल के सभी साजो सामान बेच दिए. सन् 2009 में 200 करोड़ के निवेश से अगले साल तक रैयाम मिल को चालू कर देने का दावा करने वाली यह कंपनी मिल की पुरानी संपत्ति को बेचने के अलावा अब तक कोई सकारात्मक पहल नहीं कर सकी. वैसे बिहार सरकार ने अब तक कुल पांच मिलों को निजी हाथों में सौंपा है जिनमें से केवल दो सुगौली और लौरिया चीनी मिल एक बार फिर चालू हो पाई हैं जबकि रैयाम और सकरी मिलों का भविष्य निजी हाथों में जाने के वाबजूद अंधकारमय है.
मुश्किलें किसने बढ़ाईं?
निवेशकों की रुचि चीनी उत्पादन में कम ही रही, वे इथेनॉल के लिए चीनी मिल लेना चाहते थे, जबकि राज्य सरकार को यह अधिकार नहीं रहा. क्योंकि 28 दिसंबर 2007 से पहले गन्ने के रस से सीधे इथेनॉल बनाने की मंजूरी थी. उस समय बिहार में चीनी मिलों के लिए प्रयास तेज नहीं हो सका, जब प्रयास तेज हुआ तब दिसंबर 2007 में गन्ना (नियंत्रण) आदेश 1996 में संशोधन किया गया, जिसके तहत सिर्फ चीनी मिलें ही इथेनॉल बना सकती हैं. इसका सीधा असर बिहार पर पड़ा. मुश्किलें यहीं से शुरू होती हैं. ऐसे में बंद चीनी मिलों को चालू करा पाना एक बड़ी चुनौती आज भी है. जानकारों का कहना है कि राज्य सरकार पहले पांच साल के कार्यकाल में निवेशकों का भरोसा जीतने का प्रयास करती रही. जब निवेशकों की रुचि जगी है, तब कांग्रेस के नेत्रित्व वाली यूपीए की केंद्र सरकार ने गन्ने के रस से इथेनॉल बनाने की मांग को खारिज कर राज्य में बड़े निवेश को प्रभावित कर दिया. जो निवेशक चीनी मिलों को खरीदने के शुरुआती दौर में इच्छा प्रकट की थी वो भी धीरे-धीरे अपने प्रस्ताव वापस लेते चले गए.
राज्य को हुआ बड़ा नुकसान
बिहार में जैसे ही चीनी मिल बंद होने लगी वैसे ही राज्य में बेरोजगारी की दर बहुत तेज़ी से बढ़ने लगी. बिहार के लाखों प्रवासी रोजगार के लिए अन्य राज्यों एंव देशों को पलायन करने लगे. यह अपने आप में बहुत बड़ी समस्या है.
कैसे मिलेगा चीनी मिलों को पुनर्जीवन
• केन्द्र और राज्य सरकारों को साथ मिल कर चीनी मिलों के संरक्षण पर ध्यान देना होगा
• चीनी मिल में बेकार पड़ी मशीनों को बेचकर किसानों का पैसा लौटाने की जरुरत है
• मिलों के लिए फिर से टेंडर निकाला जाए
• कम वैट लगाकर उत्पादन का सुचारु रुप से संचालन किया जाए
• किसानों को ईंख उत्पादन पर जागरुक करने आवश्यकता है
• बिजली आपूर्ति का प्रबंधन ठीक करना होगा
• मिल तक उच्च स्तरीय सड़कों का निर्माण करना होगा
बिहार में चीनी मिलों को दोबारा जिंदा करने के लिए जिन चीजों की ज़रूरत है उनमें राज्य और केंद्र सरकारों में ताल मेल बहुत महत्वपूर्ण है. ऐसे में यह ज़रूरी हो जाता है कि राज्य में भी ऐसी सरकार बने जो सब चीजों से ज्यादा विकास के बारे में सोचे और इसके लिए केंद्र के साथ मिल कर काम करे. अब इसका फैसला जनता को करना है कि बिहार में किसकी सरकार बने जो यह काम सुचारू रूप से कर सकती है cheap generic cialis online.

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