बदहाल शिक्षा की तस्वीर बदलनी चाहिए

बिहार में शिक्षा की वर्तमान बदहाली को देख कर किसी के लिए भी, ख़ास तौर से नई पीढ़ी के लिए, यह अंदाज़ा लगाना बहुत ही मुश्किल होगा कि यही राज्य कभी दुनियाभर में उत्कृष्ट शिक्षा के लिए प्रसिद्ध था। प्राचीन काल में मगध राज्य (वर्तमान बिहार) शिक्षा और अनुसंधान के मैदान में सबसे सम्मानित नाम था, जिसकी रौशनी दूर-दूर तक फैली हुई थी। विश्व प्रसिद्ध नालंदा विश्वविद्यालय और विक्रमशिला विश्वविद्यालय दोनों बिहार ही में थे। उच्च कोटि का बुनियादी ढांचा और गुणवत्ता से परिपूर्ण शिक्षा इसकी ताक़त थी, जो विद्यार्थियों को न केवल देश के कोने-कोने से बल्कि विदेशों से भी अपनी ओर आकर्षित करते थे, शिक्षा की यह ऊंचाई और चमक अब इतिहास के पन्नों में ही नज़र आती है, क्योंकि राज्य सरकार द्वारा दी जा रही वर्तमान शिक्षा में इसकी कोई झलक दिखाई नहीं पड़ती है।
1बिहार में शिक्षा की स्थिति कितनी चरमराई हुई है इसे केवल आंकड़ों के माध्यम से नहीं जाना जा सकता। फिर भी, मोटे तौर पर यह हमें यहां के शिक्षा की गिरती सेहत को समझने में मदद ज़रूर करती है। साक्षरता दर, जो यह दर्शाता है कि किसी क्षेत्र में उसकी जनसंख्या की तुलना में कितने लोग साक्षर हैं, का अगर तुलनात्मक अध्ययन करें तो शिक्षा के क्षेत्र में बिहार की तस्वीर काफी धुंधली दिखाई देती है। साक्षरता दर में बिहार 63.8 प्रतिशत के साथ न केवल देश के अन्य राज्यों की तुलना में सबसे निचले पायदान पर है, बल्कि राष्ट्रीय औसत (74 प्रतिशत) से भी बहुत नीचे है। साक्षरता दर में महिलाओं की स्थिति और भी चिंताजनक है। केवल 53 प्रतिशत महिलाएं ही साक्षर हैं बाकि 47 प्रतिशत कुछ भी लिख या पढ़ नहीं सकतीं। इसी साक्षरता के पैमाने से अगर राज्य के गांव और शहर की तुलना करें तो एक व्यापक असमानता देखने को मिलती है। शहरों में जहां पुरुष तीन-चैथाई से अधिक साक्षर हैं, वहीं ग्रामीण क्षेत्र में वे अल्पमत में हैं, यानि महिलाएं पुरुष से अधिक साक्षर हैं, जबकि केवल 18 प्रतिशत महिलाएं ही शिक्षित हैं। विभिन्न समुदायों के बीच भी शिक्षा के इस अंतर को देखा जा सकता है। अनुसूचित जाती तथा अनुसूचित जनजाति जैसे मुसहर और भुनिया में बाक़ि समुदायों के मुक़ाबले में शिक्षा का स्तर काफी नीचे है। इन आंकड़ों से ये स्पष्ट हो जाता है कि आज़ादी के 68 साल बाद भी राज्य के लगभग 40 प्रतिशत लोग शिक्षा की रौशनी से कोसों दूर हैं।
शिक्षा में गुणवत्ता को सुनिश्चित करने के लिए स्कूल के बुनियादी ढांचे का व्यवस्थित होना आवश्यक है। अधिकांश स्कूलों में बुनियादी सुविधओं की भारी कमी हैं, जैसे पर्याप्त कक्षाएं, छात्राओं के लिए अलग से शौचालय, पठन-पाठन तथा खेल से संबंधित सामग्री, आदि। इन सुविधाओं के अभाव में अपेक्षित संख्या में बच्चों का नामांकन तथा उनके ठहराव को सुनिश्चित नहीं किया जा सकता, ख़ास तौर से शौचालय के अभाव में लड़कियों को। बुनियादी ढांचे में सबसे ज़रूरी है स्कूल की इमारत। बिहार में केवल 68 प्रतिशत प्राथमिक विद्यालयों के पास पक्की इमारत है बाकि स्कूल या तो अर्ध-पक्के या फिर कच्चे मकान में ही चलते हैं। स्कूलों में पीने के पानी की सुविधा तो किसी हद तक है, लेकिन लड़कियों के लिए अलग से टाॅयलेट की सुविधा अभी भी पर्याप्त नहीं है। केवल 20 प्रतिशत स्कूलों में ही लड़कियों के लिए अलग से टाॅयलेट की व्यवस्था है, बाक़ि में या तो सामान्य टाॅयलेट है या फिर है ही नहीं। ऐसा प्रायः देखने को मिलता है कि बड़ी क्लास में लड़कियों की तादाद कम होती है। जैसे-जैसे क्लास बढ़ती जाती है, लड़कियों के स्कूल से निकलने (ड्रॉप-आउट) की प्रक्रिया भी शुरू हो जाती है। स्कूल में लड़कियों के लिए अलग से टाॅयलेट का न होना इनकी बढ़ती हुई ‘ड्रॉप-आउट’ दर का एक बड़ा कारण बन गया है।
बच्चों में कुपोषण को दूर करने के लिए सरकार का ‘मिड-डे मील प्रोग्राम’ एक महत्वाकांक्षी प्रोग्राम माना जाता है। काग़ज़ों पर भले ही इसमें बड़ी-बड़ी मह्त्वाकांक्षा छुपी हो लेकिन बिहार में धरातल की कहानी तो कुछ और ही कहती है। बच्चों की थाली में परोसे गए भोजन का पौष्टिकता से कोई नाता नहीं होता है। अक्सर अभिभावक ये शिकायत करते हुए मिल जाते हैं कि उनके बच्चों को मिड-डे मील के नाम पर केवल खिचड़ी खिलाई जाती है। बच्चों की थाली में पौष्टिक-रहित खाना परोस कर कुपोषण दूर करने की यह एक अनोखी पहल है। यह भी दिलचस्प है कि केवल 8 प्रतिशत स्कूलों में ही भोजन पकाने के लिए किचन-शेड की व्यवस्था है।
आज बिहार में शिक्षकों की अनुपस्थिति एक जटिल समस्या बन गई है, जो अनुमानित रूप से 26 प्रतिशत तक है। इस अनुपस्थिति के दो महत्वपूर्ण कारण हैं, पहला, शिक्षकों के कार्य तथा उनके प्रदर्शन की निगरानी का अभाव होना, और दूसरा, विभिन्न सरकारी कार्यों में शिक्षकों का भागीदार बनाना। यूनीसेफ के अनुमान के मुताबिक़ अगर सरकारी काम-काज और छुट्टियों को अलग कर दिया जाए, तो एक शिक्षक वर्ष में कक्षा के अंदर केवल दो महीने ही व्यतीत करते हैं। ऐसे में बच्चों की शिक्षा का हश्र क्या होगा, इसे आसानी से समझा जा सकता है।
बिहार के स्कूलों में एक और विचित्र समस्या पाई जाती है। ये है, पाठ्य पुस्तकों का बच्चों तक विलंब से पहुंचना। पुस्तकों की विलंबित आपूर्ति से पढ़ाई के कार्यों में कई तरह की दिक़्क़तें आती हैं और यहां भी नुक़सान बच्चों को ही उठाना पड़ता है। शैक्षणिक सत्र आमतौर पर मार्च में शुरू हो जाता है, परन्तु पाठ्य पुस्तक स्कूलों तक अगस्त से पहले नहीं पहुंच पाती है। कभी-कभी तो ये नवम्बर में आती है, जिससे बच्चों के शैक्षणिक-सत्र का अच्छा ख़़ासा समय बिना किसी पढ़ाई के ही नष्ट हो जाता है।
बिहार में शिक्षा की बिगड़ती सूरत का अंदाज़ा ‘आउट-ऑफ-स्कूल’ बच्चों की संख्या और ‘ड्रॉप-आउट’ दर से भी लगाया जा सकता है। सामाजिक एवं ग्रामीण अनुसंधान, बिहार के अनुसार बिहार में ‘आउट-ऑफ-स्कूल’ बच्चों की संख्या पूरे देश में सबसे अधिक है, यहां तक कि इसने सबसे अधिक जनसंख्या वाले राज्य उत्तर प्रदेश को भी इस मामले में पीछे छोड़ दिया है। देश के अनुमानित एक करोड़ 35 लाख ‘आउट-ऑफ-स्कूल’ बच्चों में अकेले बिहार के 30 लाख से ज़्यादा बच्चे हैं यानि उनका हिस्सा लग भग एक चैथाई (23.4 प्रतिशत) है। इसके अलावा जहां ‘ड्रॉप-आउट’ का राष्ट्रीय औसत 50 प्रतिशत है वहीं बिहार में यह दर 65 प्रतिशत से अधिक है। इसका मतलब ये है कि कक्षा एक में प्रवेश करने वाले हर 100 में से केवल 13 बच्चे ही 8वीं तक पहुंच पाते हैं। इतनी अधिक संख्या में ड्रॉप-आउट होने के कई कारण हैं, जैसे, स्कूल में शिक्षण कार्य का ठीक नहीं होना, बच्चों को पढ़ाई गई विषय-वस्तु का समझ में नहीं आना, बच्चों को शारीरिक दंड मिलना, बालिकाओं के लिए स्कूल मे अलग से टाॅयलेट की व्यवस्था का नहीं होना, अभिभावकों का पढ़ाई के प्रति उदासीन होना, ग़रीबी, बाल-मज़दूरी, इत्यादि।
‘आउट-ऑफ-स्कूल’ बच्चों में 40 प्रतिशत पिछड़ी जाती के हैं, जबकि अनुसूचित जाति के 35 और मुसलमानों के 20 प्रतिशत बच्चे स्कूल से बाहर हैं। ग़रीब परिवार के बच्चे दाख़िला तो ले लेते हैं लेकिन जल्द ही स्कूल से
बाहर हो जाते हैं। उनमें ड्रॉप-आउट रेट बहुत अधिक है। इसका मुख्य कारण है बाल-मज़दूरी। या तो उनसे घर का काम (लड़कियों से) लिया जाता है या फिर बाहर का काम (लड़के और लड़कियां दोनों को) करने के लिए मजबूर किया जाता है। ‘‘सड़क और कामकाजी बच्चों’’ को स्कूल जाने का मौक़ा नहीं मिल पाता है।
बिहार में स्कूल जाने वाले बच्चों में एक बड़ा तबक़ा पहली पीढ़ी के शिक्षार्थियों का है। ये बच्चे अपने परिवार से किसी भी तरह की शैक्षिक मदद की उम्मीद नहीं रख सकते। ऐसे बच्चों को ‘सर्व शिक्षा अभियान’ के अन्दर, ‘विद्यालय चलो केंद्र’, ‘प्रयास केंद्र’ या ‘उत्कर्ष केंद्र’, इत्यादि वैकल्पिक और अभिनव शिक्षा कार्यक्रमों द्वारा मदद दी जा रही है। दिक़्क़त की बात ये है कि इन बच्चों को न तो विशिष्ट पाठ्यक्रम के द्वारा पढ़ाया जाता है और न ही योग्य शिक्षकों द्वारा। ज़्यादातर मामलों में इन बच्चों को कम अनुभवी और अयोग्य शिक्षकों के मातेहत रखा जाता है।
आज के दौर में नागरिक समाज (सिविल सोसाइटी) राष्ट्र निर्माण में अहम रोल अदा कर रहा है। बिहार के संदर्भ में इसकी अहमियत और भी अधिक बढ़ जाती है। लेकिन दिक्कत यह है कि प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में यहां इनकी भागीदारी या तो कम है या फिर समस्याग्रस्त है। बहुत कम ‘गै़र-सरकारी संस्था’ (एनजीओ) हैं जो शिक्षा के क्षेत्र में प्रभावशाली ढंग से काम कर रहे हैं।
शिक्षा से जुड़ी तमाम प्रक्रियाओं का केंद्र-बिंदु होते हुए शिक्षकगण बच्चों के भविष्य निर्माण में निर्णायक भूमिका अदा करते हैं। अगर एक शिक्षक उत्साह के साथ बच्चों को सीखने-सिखाने में रूचि लेता है और समाज तथा अभिभावकों के साथ मिल कर उनकी उन्नति के लिए प्रयास करता है तो वह अकेले अपने दम पर बुनियादी सुविधाओं के नहीं होते हुए भी बड़ा परिवर्तन ला सकता है। परन्तु, शिक्षकों को अपने काम में प्रभावी बनाने के लिए यह आवश्यक है कि उनकी क्षमता निर्माण का काम निरंतर चलता रहे। बिहार में बेश्तर शिक्षक उम्दा प्रशिक्षण के अनुभव से महरूम हैं। अतः, शिक्षण-कौशल के आधुनिक तौर-तरीक़ों से अंजान यहां के शिक्षक बच्चों को रटे-रटाए पुराने तरीक़ों से ही पढ़ाते हैं। आज दुनिया भर में शिक्षा के क्षेत्र में बड़े बदलाव देखे जा रहे हैं। रटने और विषय-वस्तु को घोंट कर पीने के बजाय उसे समझने की ज़रूरत पर ज़ोर दिया जा रहा है। बच्चों को सोचने, समझने, तर्क और वितर्क करने, विश्लेषण करने, आदि जैसे कौशलों से संवारने की ज़रूरत है। इस ओर बदलाव के लिए न केवल प्रशिक्षण कार्य को ठीक करना पड़ेगा बल्कि शिक्षकों के चयन प्रक्रिया में भी उचित बदलाव
लाना होगा। यह सुनिश्चित करना होगा के चयन प्रक्रिया निष्पक्ष और पारदर्शी हो, ताकि अच्छी प्रतिभा को शिक्षण कार्य से जोड़ा जा सके।
हाल ही में पुराने शिक्षकों के सेवा-निवृत्त होने से पैदा रिक्त स्थान की पूर्ति के लिए बिहार में व्यापक स्तर पर बहाली हुई। 12वीं कक्षा के बोर्ड एग्ज़ाम में लाए गए अंकों को चयन का आधार बनाया गया। अर्थात, आवेदकों को किसी भी प्रकार की प्रतियोगिता परीक्षा पास करने की ज़रूरत नहीं थी। साथ ही, चयन प्रक्रिया की अहम बागडोर पंचायत के हाथों सोंपी गई, जिनकी पहचान पहले ही काम से कम और भ्रष्टाचार से ज़्यादा होने लगी थी। उन्हें ये ज़िम्मेदारी तो दी गई, लेकिन इस कार्यक्रम को सुचारू रूप से अंजाम देने तथा प्रत्याशियों की प्रतिभा का आंकलन करने के लिए किसी भी प्रकार का प्रशिक्षण नहीं दिया गया। सारा खेल पैसों पर सिमट कर आ गया, और यही इस चयन का मुख्य आधार बन गया। इस प्रक्रिया पर कई तरह के सवाल खड़े हुए। नीतीश सरकार से कितनी बड़ी भूल हो गई थी, यह सच्चाई लोगों के सामने जल्द ही आ गई। बी.बी.सी. हिंदी ने जब इसके ऊपर सर्वेक्षण किया तो उसे चैंकाने वाले तथ्य हाथ लगे। बड़ी संख्या में ऐसे शिक्षक मिले जो योग्यता और कौशल के नाम पर शून्य थे। बहुत से ‘शिक्षक’ अपना नाम तक नहीं लिख सकते थे। एक स्थानीय न्यूज़ चैनल ने भी राज्य के कुछ स्कूलों में नए चयनित शिक्षकों की पड़ताल की तो मालूम हुआ कि बच्चों को ऐसे शिक्षक पढ़ा रहे हैं, जिन्हें बिहार और भारत की राजधानी का कोई अता-पता नहीं है। वे यह नहीं बता सकते थे कि साल में कितने दिन होते हैं और भारत के प्रधान मंत्री का क्या नाम है।
आज बिहार में शिक्षा की सूरत बड़ी ही बदहाल है। शिक्षा के नाम पर बच्चों को अधकचरे ज्ञान से सींचा जा रहा है। इस से उपज कैसी होगी, समझना कठिन नहीं है।

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